सांप्रदायिक सद्भाव के साथ संपन्न हुआ ईद-उल-अज़हा का त्योहार।
लोगों ने क़ुरबानी देकर सुन्नत-ए-इब्राहीमी पर किया अमल।
REPORT : FAISAL RAHMANI
GAYA : गया में ईद-उल-अज़हा का त्योहार धूमधाम और अक़ीदत के साथ संपन्न हुआ। रविवार को सुबह के पहले पहर से ही शहर के ईदगाहों और मस्जिदों में ईद-उल-अज़हा की विशेष नमाज अदा की जाने लगी।
मुख्य ईदगाह गांधी मैदान में 7:45 बजे ईद-ए-क़ुरबां की नमाज़ अदा की गई। मोहम्मद फ़ारूक़ की इमामत में हज़ारों की तादाद में मुसलमानों ने नमाज़ पढ़ी।
वहीं, जामा मस्जिद, छत्ता मस्जिद, मुन्नी मस्जिद, पीर मंसूर, अल-मनार मस्जिद शिबली कॉलोनी, करीमगंज मस्जिद, न्यू करीमगंज मस्जिद, ख़ानक़ाह चिश्तिया मुनअमिया रामसागर समेत शहर के हर मस्जिद और ईदगाह में उम्मत-ए-मुहम्मदिया ने नमाज़-ए-ईद-ए-क़ुरबां अदा की। इस दौरान मुल्क की तरक़्क़ी, ख़ुशहाली, यकजहती, अमन-शांति, आपसी प्रम व भाईचारा की दुआएं मांगी गईं। नमाजियों ने बारिश होने की भी दुआएं मांगी।

ज़िला व पुलिस प्रशासन पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त दिखा। गांधी मैदान में एसडीओ सदर व सिटी डीएसपी पूरे दलबल के साथ मौजूद थे। सैकड़ों बाइकसवार पुलिस का गश्ती दल और पुलिस के आला अफ़सरान ने गश्त कर विधि-व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखा। कहीं से किसी अप्रिय घटना की शिकायत नहीं आई।
वहीं, जनता दल यू के ज़िला महानगर अध्यक्ष राजू बरनवाल, सांसद विजय मांझी, पूर्व ज़िलाध्यक्ष शौकत अली, समी ख़ान, शाहजी क़मर, अब्दुल क़ादिर, लालजी प्रसाद भाजपा नेता व पूर्व वार्ड पार्षद संतोष सिंह समेत बड़ी तादाद में लोगों ने गांधी मैदान के बाहर नमाज़ियों को गुलाब का फूल देकर सद्भाव और प्रेम का संदेश दिया।
ग़ौरतलब है कि ईद-उल-अज़हा या ईद-ए-क़ुरबां मुसलमानों का एक प्रमुख त्योहार है। रमज़ान के मुक़द्दस महीने के ख़त्म होने के तक़रीबन सत्तर दिनों बाद इसे मनाया जाता है।
इस्लामिक मान्यता के अनुसार क़ुरबानी पैग़ंबर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है। वो हमेशा अल्लाह के दिखाए सच्चाई के रास्ते पर चलते थे और सभी से प्रेम करते थे। वो दूसरे लोगों को भी अल्लाह के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते थे।
बताया जाता है कि एक दिन अल्लाह ने उन्हें सपने में अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुरबान करने का हुक्म दिया। हज़रत इब्राहीम को अपना बेटा इस्माईल सबसे ज़्यादा प्यारा था। इसके मद्देनज़र उन्होंने फ़ैसला लेते हुए अपने बेटे को अल्लाह की राह में क़ुरबान करने का फ़ैसला किया। उनके इस फ़ैसले पर उनके बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम भी ख़ुशी-ख़ुशी रज़ामंद हो गए।
बेटे की क़ुरबानी देते वक़्त उनका हाथ न रुक जाए इसलिए पैंग़बर ने बेटे हज़रत इस्माइल की सलाह पर अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर छुरी चलाई। इसके बाद जब उन्होंने आंखों से पट्टी हटाई तो बेटे इस्माईल सही-सलामत थे। उनकी जगह एक दुंबा (भेड़) ज़िबह किया हुआ पड़ा था। यह वाक़या अरबी कैलेंडर के आख़िरी यानी बारहवें महीने ज़िल-हिज्जा की दस तारीख़ का है। तभी से क़ुरबानी देने की प्रथा शुरू हुई जो आज भी निभाई जा रही है।
अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है।
ईद-ए-क़ुरबां का मतलब है बलिदान की भावना। अरबी में क़र्ब नज़दीकी या बहुत पास रहने को कहते हैं। अर्थात इस मौक़े पर अल्लाह पाक इंसान के बहुत क़रीब हो जाता है।

