गया : हिन्दी की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार गीतांजलि श्री  को साल 2022 का अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज  दिया गया है. उनके उपन्यास रेत समाधि के लिए उन्हें प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.इस सुखद अवसर  मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज के हिन्दी विभाग ने उन्हें शुभकामनायें दी हैं. हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ.इबरार  खान ने लेखिका की इस बात को दोहराया कि गीतांजलि श्री ने स्वयं कहा कि मैंने कभी बुकर का सपना नहीं देखा था, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा कर सकती हूं. मैं खुश और सम्मानित महसूस कर रही हूं. हिंदी विभाग के सहायक प्रोफेसर और साहित्यकार डॉ.जियाउर रहमान जाफरी ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए गीतांजलि श्री के बारे में बताया कि  लेखिका गीतांजलि श्री का अनुवादित हिंदी उपन्यास, 'टॉम्ब ऑफ सैंड', प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2022 से सम्मानित होने वाली भारतीय भाषा में लिखी जाने वाली पहली पुस्तक बन गई है. जिसे उन्होंने मूल रूप से हिंदी में रेत समाधि के नाम से लिखा था. विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ नुसरत जबीं सिद्धकी ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करती हुई  विस्तार से बताया कि
1957 में मैनपुरी में जन्मीं गीतांजलि श्री का बचपन उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में बीता था. यहां उनके पिता एक सिविल सेवक के रूप में तैनात थे. उन्होंने अपनी शिक्षा स्थानीय अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हासिल की थी. उत्तर प्रदेश में पली-बढ़ी गीतांजलि श्री को हिंदी से गहरा लगाव है.

‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के लिए जब ‘शॉर्टलिस्ट’ किया गया तभी ये हिंदी भाषा की पहली कृति बन गया. अब 2022 का बुकर प्राइज भी इसको मिला है. गीतांजलि श्री की यह बुक मूल रूप से हिंदी में ‘रेत समाधि’ के नाम से प्रकाशित हुई थी. इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ डेजी रॉकवेल ने किया है और जूरी के सदस्यों ने इसे शानदार बताया.

जब 'टॉम्ब ऑफ सैंड' का सेलेक्शन बुकर के लिए किया गया था, तो गीतांजलि श्री ने कहा था कि यह बहुत ही खास तरह की मान्यता है. जब कोई काम दूर बैठे अज्ञात लोगों को आकर्षित करता है. यही सच्चा समर्थन है. काम अच्छा होना चाहिए, अनुवाद बेहतरीन होना चाहिए. डेजी और मेरे लिए यह बहुत अच्छा पल है. अब उनके उपन्यास ने 2022 का बुकर प्राइज अपने नाम कर लिया है.