दुनिया और आख़िरत में कामयाबी का रास्ता दिखाता है क़ुरआन : प्रो. ज़मां।
14 से 23 अक्टूबर तक हो रहा है रुजू-उल-क़ुरआन कार्यक्रम।
REPORT : FAISAL RAHMANI
GAYA : क़ुरआन से रिश्ता जोड़ें मुहिम के तहत रुजू-उल-क़ुरआन कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। यह कार्यक्रम 14 से 23 अक्टूबर तक चलेगा। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की तरफ़ से आयोजित इस कार्यक्रम में लोगों को क़ुरआन के पढ़ने, सीखने और सिखाने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
इसी कड़ी में, शिबली कॉलोनी न्यू करीमगंज में स्थित अल-मनार मस्जिद में जुमा की नमाज़ से पहले हुई तकरीर में प्रो. मोहम्मद बदीउज़्ज़मां ने नमाज़ियों को संबोधित करते हुए कहा कि अल्लाह ने अपने बंदों की रहनुमाई के लिए अपने कुछ ख़ास बंदों को भेजा जिन्हें हम नबी या रसूल कहते हैं। अल्लाह तआला ने उन नबियों पर अपनी किताबें नाज़िल कीं। लेकिन तमाम किताबें सुरक्षित नहीं रह सकीं। उनके मानने वालों ने उनमें अपने-अपने हिसाब से संशोधन कर लिया। कुछ बुनियादी उपदेश उनसे हटा कर अपनी ख़्वाहिशों के मुताबिक़ कुछ चीज़ें उनमें शामिल कर लीं। इस तरह अल्लाह की हिदायत गुम हो गई और उसकी रज़ा जानने का कोई विश्वसनीय ज़रिया नहीं बचा।

उन्होंने बताया कि सबसे आख़िर में अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी रसूल पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब पर क़ुरआन मजीद नाज़िल किया। इसके आयात और अल्फाज़ उसी तरह सुरक्षित हैं जैसे वह नाज़िल हुआ था। इसलिए कि अल्लाह तआला ने उसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ख़ुद लिया है।
प्रो. ज़मां ने बताया कि चौदह सौ साल से ज़्यादा वक़्त के गुज़र जाने के बावजूद क़ुरआन में मामूली सा भी बदलाव नहीं हुआ है। इस के नुस्ख़े बेशुमार तादाद में दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं। यह किताब करोड़ों इंसानों के सीनों में महफूज़ हैं यानी पूरी क़ुरआन लोगों को याद है। दुनिया की सभी भाषाओं में इसके अनुवाद भी हो हो चुके हैं।
प्रो. मोहम्मद बदीउज़्ज़मां ने कहा कि क़ुरआन हिदायत की किताब है। यह दुनिया और आख़िरत में कामयाबी का रास्ता दिखाती है। इंसानों को गुमराही के अंधेरे को दूर करती है। यह किताब पूरी इंसानियत के लिए सबसे बड़ी नेअमत है और मुसलमानों की सबसे बड़ी ताक़त।
उन्होंने कहा कि जो शख़्स क़ुरआन से दूरी बनाता है उसके नतीजे बुरे होते हैं। क़ुरआन से दूरी ने मुसलमानों को बहुत ही ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया है। उनमें तरह-तरह की गुमराही फैल गई है।
प्रो. ज़मां ने कहा कि क़ुरआन नाज़िल किया गया था ताकि उसके हुक्मों पर अमल किया जाए। उसके ज़रिए अल्लाह की रज़ा हासिल करने के तरीक़े और नाराज़गी के कारण मालूम किए जाएं। जिन कामों का हुक्म दिया गया है उन पर अमल किया जाए। इस तरह अल्लाह की रज़ा हासिल करने की कोशिश की जाए।
अपने संबोधन में प्रो. मोहम्मद बदीउज़्ज़मां ने कहा कि जब तक हम क़ुरआन मजीद से हिदायत लेते रहे और उसकी रहनुमाई हासिल करते रहे तब तक उम्मत-ए-मुहम्मदिया को दुनिया में बुलंदियां हासिल हुईं। लेकिन ज्यों-ज्यों वो क़ुरआन से दूर होते गए उसमें गिरावट आती चली गई।
इस तरह अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद साहब का यह कथन सही साबित हुआ कि अल्लाह इस किताब के ज़रिए कुछ लोगों को बुलंदी अता करता है और इस किताब पर अमल नहीं करने वालों को पस्ती में धकेल देता है। (सही मुस्लिम : 817)
अपने संबोधन को समाप्त करते हुए प्रो. मोहम्मद बदीउज़्ज़मां ने कहा कि
मुसलमानों की तरक़्क़ी और तनज़्ज़ली क़ुरआन मजीद से वाबिस्ता है। अगर हम मज़बूती से इससे रहनुमाई हासिल करेंगे और उसके हुक्म पर चलेंगे तो तरक़्क़ी करेंगे। साथ ही, हम इज़्ज़त-ओ-अज़मत भी पाएंगे। लेकिन अगर हम इस से मुंह मोड़ लेंगे, इससे हिदायत नहीं हासिल करेंगे और इसके बताए हुए तरीक़ों पर नहीं चलेंगे तो ज़िल्लत और रुसवाई हमारा मुक़द्दर बनेगा।

