Rakesh Kumar
गया में बिजली व्यवस्था अब सुविधा नहीं, जनता के धैर्य की परीक्षा बन चुकी है। भीषण गर्मी में जहां तापमान 45 डिग्री पार कर रहा है, वहीं साउथ बिहार पावर पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (एसबीपीडीसीएल) की व्यवस्था लोगों को राहत देने के बजाय रोज नई मुसीबत दे रही है। हाल यह है कि लोगों ने अब घड़ी देखकर बिजली आने-जाने का अनुमान लगाना छोड़ दिया है, क्योंकि यहां बिजली “शेड्यूल” से नहीं, “मर्जी” से आती-जाती दिख रही है।
“5 मिनट पंखा चलाओ, एक घंटा से ज़्यादा पसीने में डूबे रहो”
यह अब गया जी शहर की नई हकीकत बन चुकी है। बिजली आंख-मिचौली भी नहीं खेल रही, बल्कि पूरा लुका-छिपी खेल रही है। पांच मिनट के लिए आती है, लोगों को उम्मीद देती है और फिर अचानक गायब हो जाती है। रात भर लोग छतों पर करवट बदलते रहते हैं। बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे, बुजुर्ग गर्मी से बेहाल हैं और बीमार मरीजों की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक हो चुकी है।
गयाजी के लोग अब मौसम विभाग से कम और बिजली के “दर्शन” का इंतजार ज्यादा कर रहे हैं। कहीं इनवर्टर जवाब दे चुका है, तो कहीं लोग मोबाइल की टॉर्च जलाकर हाथ वाला पंखा ढूंढ रहे हैं। ऐसा लगता है कि एसबीपीडीसीएल ने तय कर लिया है कि जब सूरज 45 डिग्री पर तप रहा है, तो जनता के धैर्य का भी “हीट टेस्ट” होना चाहिए।
हर साल गर्मी आते ही सिस्टम क्यों हो जाता है फेल?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल यही हाल क्यों होता है? गर्मी शुरू होने से पहले एसबीपीडीसीएल बड़े-बड़े दावे करता है। कहा जाता है कि तार बदल दिए गए, मेंटेनेंस कर लिया गया, ट्रांसफॉर्मर दुरुस्त हैं और व्यवस्था पूरी तरह तैयार है। लेकिन जैसे ही तापमान बढ़ता है, घंटों बिजली कटौती, लो-वोल्टेज और बार-बार ट्रिपिंग की समस्या शुरू हो जाती है।
कागजों पर तैयारी पूरी रहती है, लेकिन जमीन पर व्यवस्था पहली बारिश में बह जाने वाले पोस्टर जैसी नजर आती है। शहर के लोग पूछ रहे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी हर साल वही संकट क्यों लौट आता है?
नया वायर ज्यादा सुरक्षित या ज्यादा खतरनाक?
इंडिया पावर द्वारा लगाए गए पुराने वायर को हटाकर नया वायर लगाया गया था। कहा गया था कि नई व्यवस्था पहले से ज्यादा मजबूत और सुरक्षित होगी। लेकिन विडंबना देखिए कि सबसे ज्यादा आग अब इन्हीं नए वायरों में लग रही है। शहर के लोग डर और गर्मी दोनों झेल रहे हैं। एसबीपीडीसीएल के दावे अब भरोसे नहीं, मजाक का विषय बनते जा रहे हैं।
इंडिया पावर के समय सड़क पर उतरने वाले अब खामोश क्यों?
एक समय था जब गया में इंडिया पावर बिजली संचालन की जिम्मेदारी संभाल रही थी। उस दौर में अगर थोड़ी सी भी गड़बड़ी होती थी तो पूरा शहर इंडिया पावर के खिलाफ खड़ा हो जाता था। लोग संगठन बनाते थे, संघर्ष मोर्चा तैयार होता था, धरना-प्रदर्शन होते थे और जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाता था।
लेकिन आज हालात उससे कहीं ज्यादा खराब हैं, फिर भी उन तथाकथित संगठनों और आवाज उठाने वालों के मुंह में जैसे दही जम गई है। अब न संघर्ष मोर्चा दिखता है, न सड़क पर कोई आंदोलन और न ही जनता की पीड़ा पर खुलकर बोलने वाले लोग नजर आते हैं। सवाल उठता है कि आखिर यह खामोशी क्यों है?
बढ़ता टैरिफ, घटती सुविधा
एक तरफ बिजली का टैरिफ लगातार बढ़ाया जा रहा है, दूसरी तरफ सेवा बदतर होती जा रही है। उपभोक्ताओं से समय पर बिल वसूला जाता है, स्मार्ट मीटर और प्री-पेड मीटर लगाने पर जोर दिया जाता है, लेकिन जब जनता को सुविधा देने की बात आती है तो पूरा सिस्टम ठप नजर आता है।
सवाल यह है कि आखिर स्मार्ट मीटर लगाने से जनता को क्या मिला? बिजली की उपलब्धता सुधरी या सिर्फ बिल वसूली का तरीका आधुनिक हुआ?
कस्टमर केयर नंबर भी जनता की नहीं सुन रहा
स्थिति इतनी खराब है कि एसबीपीडीसीएल का कस्टमर केयर नंबर तक लोगों की परेशानी सुनने को तैयार नहीं दिखता। घंटों कॉल लगाने के बाद भी या तो नंबर व्यस्त मिलता है या कॉल रिसीव ही नहीं होती। अगर कहीं फॉल्ट हो जाए तो उसे ठीक होने में घंटों नहीं, कई बार पूरी रात लग जाती है।
शहर के कई इलाकों में लोग बिना बिजली के रात काटने को मजबूर हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की नींद पर इसका कोई असर नहीं दिखता।
मेंटेनेंस सिर्फ कागजों में?
मेंटेनेंस के नाम पर भी खानापूर्ति का आरोप लग रहा है। समय रहते अगर सही तरीके से रखरखाव किया जाता, जर्जर एल्युमिनियम तारों को हटाकर पूरी तरह केबलिंग की जाती, ट्रांसफॉर्मरों की क्षमता बढ़ाई जाती और लोड मैनेजमेंट पर गंभीरता से काम होता, तो शायद जनता को यह दिन नहीं देखना पड़ता।
लेकिन यहां व्यवस्था सुधारने से ज्यादा फाइलों में सुधार दिखाने की परंपरा मजबूत नजर आती है।
सबसे ज्यादा परेशान बुजुर्ग, बच्चे और मरीज
इस पूरी अव्यवस्था का सबसे ज्यादा असर घरों में रहने वाले बुजुर्गों, छोटे बच्चों और बीमार लोगों पर पड़ रहा है। उमस भरी रातों में बिना बिजली के सांस लेना तक मुश्किल हो रहा है। कई मरीजों की हालत बिगड़ रही है। छोटे बच्चे रात भर रो रहे हैं, छात्र पढ़ाई नहीं कर पा रहे और नौकरीपेशा लोग नींद पूरी न होने के कारण मानसिक तनाव झेल रहे हैं।
बिजली की यह आंख-मिचौली अब सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर मुद्दा बन चुकी है।
जनता का गुस्सा बढ़ रहा, कभी भी भड़क सकता है आंदोलन
लगातार बिजली संकट, बढ़ते टैरिफ, खराब व्यवस्था और अधिकारियों की चुप्पी ने लोगों के भीतर भारी नाराजगी पैदा कर दी है। मोहल्लों और चौक-चौराहों पर अब खुलकर लोग एसबीपीडीसीएल और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं।
अगर जल्द ही व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, घंटों की कटौती और ट्रिपिंग पर रोक नहीं लगी, तो ऐसा न हो कि जनता उग्र आंदोलन पर उतर आए। क्योंकि जब भीषण गर्मी में लोगों का धैर्य टूटता है, तब गुस्सा सड़क पर उतरने में देर नहीं लगती। प्रशासन और एसबीपीडीसीएल को इसे सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि जनता की चेतावनी समझनी चाहिए।
जिला प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में
सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन पर खड़ा होता है। आखिर जिला प्रशासन कब तक आंख मूंदे रहेगा? गया के डीएम का लचर रवैया भी सवालों के घेरे में है। जिस तरह गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, उसी तरह बिजली संकट पर भी जिम्मेदार अधिकारियों को सामने आकर जवाब देना चाहिए।
जनता को यह बताया जाना चाहिए कि आखिर हर साल गर्मी आते ही सिस्टम क्यों जवाब दे देता है? कब तक लोग इस बदहाल व्यवस्था का बोझ उठाते रहेंगे?
जनता बिल भी दे रही, गर्मी भी झेल रही
गया की जनता टैक्स भी दे रही है, बिल भी भर रही है और गर्मी भी झेल रही है। लेकिन बदले में उसे मिल क्या रहा है? अंधेरा, पसीना, परेशानी और जिम्मेदारों की चुप्पी।
अब वक्त आ गया है कि एसबीपीडीसीएल और जिला प्रशासन दोनों जनता को जवाब दें, क्योंकि यह सिर्फ बिजली का संकट नहीं, व्यवस्था की विफलता का खुला प्रमाण बन चुका है।