Rakesh Kumar
फ़ैसल रहमानी
इस्लामी कैलेंडर का नौवाँ महीना रमज़ान पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए रहमत, मग़फ़िरत और जहन्नम से निजात का महीना माना जाता है। यह महीना बंदों के लिए अल्लाह की तरफ़ से ऐसी रहमतों और बरकतों का पैग़ाम लेकर आता है, जो साल के किसी और समय में इतनी व्यापकता के साथ नसीब नहीं होतीं। रमज़ान के दिनों में मुसलमान रोज़ा रखकर, नमाज़, तिलावत-ए-क़ुरआन, ज़िक्र और दुआ के ज़रिए अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत करते हैं। लेकिन इस मुक़द्दस महीने का सबसे अहम हिस्सा उसका आख़िरी अशरा (आख़िरी दस दिन) है, जिसकी अहमियत क़ुरआन और हदीस में बड़ी स्पष्टता के साथ बयान की गई है।
रमज़ान को आम तौर पर तीन हिस्सों में बाँटा जाता है—पहला अशरा रहमत का, दूसरा मग़फ़िरत का और तीसरा जहन्नम से निजात का। आख़िरी अशरा इसी तीसरे हिस्से का नाम है, जो 21 रमज़ान से शुरू होकर ईद का चाँद नज़र आने तक जारी रहता है। इस अशरे में इबादत की फ़ज़ीलत कई गुना बढ़ जाती है, क्योंकि इसी में वह रात आती है जिसे लैलतुल क़द्र या शब-ए-क़द्र कहा जाता है। यह वह रात है जिसे क़ुरआन ने “हज़ार महीनों से बेहतर” बताया है।
क़ुरआन में आख़िरी अशरे की अहमियत
पवित्र क़ुरआन में रमज़ान और उसकी बरकतों का कई जगह उल्लेख मिलता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए हिदायत है और हिदायत तथा फ़ैसले की साफ़ निशानियाँ रखता है।”
(सूरह अल-बक़रह 2:185)
यह आयत बताती है कि रमज़ान का महीना दरअसल क़ुरआन के नुज़ूल का महीना है। लेकिन जब हम क़ुरआन की दूसरी आयतों को देखते हैं तो यह मालूम होता है कि क़ुरआन का नुज़ूल एक ख़ास रात में हुआ था।
अल्लाह तआला सूरह अल-क़द्र में फ़रमाता है:
“निस्संदेह हमने इसे (क़ुरआन को) लैलतुल क़द्र में उतारा। और तुम्हें क्या मालूम कि लैलतुल क़द्र क्या है? लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है। उस रात फ़रिश्ते और रूह (जिब्रील) अपने रब के हुक्म से हर काम के साथ उतरते हैं। वह रात पूरी तरह सलामती की होती है, सुबह होने तक।”
(सूरह अल-क़द्र 97:1-5)
इन आयतों से साफ़ तौर पर यह साबित होता है कि लैलतुल क़द्र रमज़ान की वह रात है जिसमें क़ुरआन का नुज़ूल हुआ और जिसकी बरकतें इतनी महान हैं कि एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादत से बेहतर हो जाती है। यही कारण है कि आख़िरी अशरे में मुसलमान इबादत में ख़ास मेहनत करते हैं।
हदीस की रोशनी में आख़िरी अशरा
हदीसों में आख़िरी अशरे की अहमियत और भी स्पष्ट रूप से बयान की गई है। हज़रत आयशा (रज़ि.) से रिवायत है कि जब रमज़ान का आख़िरी अशरा आता था तो नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इबादत में पहले से कहीं ज़्यादा मेहनत करते थे। वह पूरी रात इबादत में गुज़ारते, अपने घरवालों को भी जगाते और इबादत के लिए कमर कस लेते।
एक हदीस में आता है:
“जब रमज़ान का आख़िरी दस दिन शुरू होते तो रसूलुल्लाह हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी कमर कस लेते, रातों को जागते और अपने घर वालों को भी जगाते।”
(सहीह बुख़ारी)
इस हदीस से यह स्पष्ट होता है कि आख़िरी अशरा साधारण दिनों की तरह नहीं होता, बल्कि यह वह समय है जब बंदे को पूरी लगन के साथ अल्लाह की इबादत में लग जाना चाहिए।
लैलतुल क़द्र की तलाश
आख़िरी अशरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसी में लैलतुल क़द्र आती है। हदीसों के अनुसार यह रात आख़िरी दस दिनों की विषम (21, 23, 25, 27, 29) रातों में तलाश करने का हुक्म दिया गया है।
नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
“लैलतुल क़द्र को रमज़ान के आख़िरी दस दिनों की विषम रातों में तलाश करो।”
(सहीह बुख़ारी)
इस हदीस से यह समझ में आता है कि आख़िरी अशरा दरअसल उस महान रात की तलाश का समय है, जिसमें इबादत करने वाले के पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।
एक और हदीस में आता है:
“जिसने ईमान के साथ और सवाब की नीयत से लैलतुल क़द्र में क़ियाम किया, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।”
(सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम)
एतेकाफ़ की सुन्नत
आख़िरी अशरे की एक अहम सुन्नत एतेकाफ़ भी है। एतेकाफ़ का मतलब है कि इंसान दुनिया के कामों से अलग होकर मस्जिद में रहकर पूरी तरह इबादत में मशगूल हो जाए।
हज़रत आयशा (रज़ि.) से रिवायत है:
“नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में एतेकाफ़ किया करते थे, यहाँ तक कि अल्लाह ने आपको दुनिया से उठा लिया।”
(सहीह बुख़ारी)
एतेकाफ़ का उद्देश्य यह होता है कि इंसान दुनियावी मशग़लों से दूर होकर अपने दिल और रूह को पूरी तरह अल्लाह की तरफ़ मोड़ दे।
दुआ और अस्तग़फ़ार की अहमियत
आख़िरी अशरे में दुआ और अस्तग़फ़ार की भी बहुत अहमियत है। जब हज़रत आयशा (रज़ि.) ने पूछा कि अगर मुझे लैलतुल क़द्र मिल जाए तो मैं क्या दुआ करूँ, तो नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह दुआ सिखाई:
“अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़्वा फ़अफ़ु अन्नी।”
(ऐ अल्लाह! तू माफ़ करने वाला है और माफ़ी को पसंद करता है, इसलिए मुझे माफ़ कर दे।)
यह दुआ बताती है कि आख़िरी अशरा दरअसल गुनाहों से तौबा करने और अल्लाह की रहमत हासिल करने का सबसे बड़ा मौक़ा है।
इबादत का बढ़ा हुआ सवाब
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार रमज़ान में हर नेकी का सवाब कई गुना बढ़ जाता है, लेकिन आख़िरी अशरे में यह और भी अधिक हो जाता है। नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र, सदक़ा और दुआ—हर इबादत का सवाब अल्लाह के यहाँ कई गुना बढ़ जाता है।
सामाजिक और आध्यात्मिक प्रभाव
आख़िरी अशरा सिर्फ़ व्यक्तिगत इबादत का समय नहीं है, बल्कि यह समाज में आध्यात्मिक माहौल पैदा करता है। मस्जिदों में क़यामुल्लैल, तरावीह और एतेकाफ़ का माहौल बनता है। लोग एक-दूसरे को नेकियों की तरफ़ बुलाते हैं और ग़रीबों की मदद करते हैं।
इस समय मुसलमानों के दिलों में भाईचारे, सहानुभूति और इंसानियत की भावना भी बढ़ जाती है। यही वजह है कि रमज़ान को सिर्फ़ रोज़े का महीना नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को सुधारने वाला महीना कहा गया है।
आत्मशुद्धि का अवसर
आख़िरी अशरा इंसान के लिए आत्मशुद्धि का भी सबसे बड़ा अवसर है। इस दौरान इंसान अपने गुनाहों पर विचार करता है, तौबा करता है और यह संकल्प लेता है कि आगे की ज़िंदगी अल्लाह की आज्ञाओं के अनुसार बिताएगा।
इस्लामी विद्वानों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति पूरे साल की आध्यात्मिक ऊर्जा पाना चाहता है तो उसे रमज़ान के आख़िरी अशरे में विशेष रूप से इबादत करनी चाहिए।
रमज़ान का आख़िरी अशरा दरअसल वह सुनहरा समय है, जब अल्लाह की रहमत अपने चरम पर होती है। क़ुरआन और हदीस दोनों इस बात की गवाही देते हैं कि इन दस दिनों की इबादत का महत्व असाधारण है। यही वह समय है जब बंदा अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह के क़रीब हो सकता है और लैलतुल क़द्र जैसी महान रात की बरकतें हासिल कर सकता है।
इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह रमज़ान के आख़िरी अशरे को पूरी गंभीरता और समर्पण के साथ गुज़ारे। नमाज़, तिलावत, दुआ, सदक़ा और एतेकाफ़ के ज़रिए अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत करे। अगर कोई व्यक्ति इस अशरे की क़द्र कर लेता है तो यह उसके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में सफलता का कारण बन सकता है।
रमज़ान का आख़िरी अशरा दरअसल इंसान को यह याद दिलाता है कि ज़िंदगी का असली मक़सद अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा हासिल करना है। जो व्यक्ति इस सच्चाई को समझ लेता है, उसकी ज़िंदगी में आध्यात्मिक सुकून और बरकतें उतर आती हैं।
(राकेश कुमार, ब्यूरो चीफ )