बोधगया के आसपास बुद्ध से जुड़े स्थलों का समग्र विकास: समय की माँग
Rakesh Kumar
3676

बोधगया : यह बात अब निर्विवाद हो चुकी है कि हाल के वर्षों में बिहार के लगभग सभी प्रमुख पर्यटक स्थलों की सूरत और सीरत में उल्लेखनीय बदलाव आया है। सड़क, बिजली, आवास, स्वच्छता और सुरक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में राज्य ने पहले की तुलना में बेहतर प्रगति की है। इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि पर्यटन के क्षेत्र में अभी भी अपार संभावनाएँ अनछुई पड़ी हैं। विशेषकर मोक्षभूमि गया और ज्ञान-करुणा की विश्वविख्यात धरती बोधगया के संदर्भ में यह प्रश्न और अधिक गंभीर हो जाता है।

दस वर्ष पहले का बोधगया और आज का बोधगया—इन दोनों की तुलना की जाए तो परिवर्तन सहज ही आँखों को दिखता है। महाबोधि मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विस्तार, आवासीय ढाँचे में सुधार और वैश्विक पहचान का सुदृढ़ होना निस्संदेह स्वागतयोग्य है। किंतु इस चमकते हुए केंद्र के चारों ओर फैले वे स्थल, जिनका भगवान बुद्ध के जीवन और साधना से गहरा और जीवंत संबंध रहा है, आज भी अपेक्षित ध्यान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

विश्वभर में महाबोधि मंदिर परिसर के अंतर्गत स्थित सात पवित्र स्थलों—बोधिवृक्ष, अनिमेष लोचन चैत्य, चंक्रमण, अजपाल निग्रोध तरु, रत्नगृह, मुचलिन्द सरोवर और राजायतन—का विशेष उल्लेख किया जाता है। इन स्थलों को देखकर बुद्ध के ज्ञानमार्ग की संपूर्ण यात्रा का बोध होता है। ठीक इसी तर्ज पर बोधगया के आसपास फैले ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के अनेक स्थल भी हैं, जिन्हें यदि एक सुव्यवस्थित परिपथ के रूप में विकसित किया जाए तो बोधगया की पहचान और अधिक व्यापक व गहन हो सकती है।

इन स्थलों में सबसे प्रमुख है निरंजना नदी के तट पर स्थित बकरौर गांव। यह बुद्धकालीन आबाद बस्ती मानी जाती है, जहाँ कृषकपति की पुत्री सुजाता ने तपस्यारत सिद्धार्थ को खीर अर्पित की थी। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जिसने सिद्धार्थ को यह बोध कराया कि न तो अत्यधिक भोग और न ही अत्यधिक तप—बल्कि मध्यम मार्ग ही मुक्ति का पथ है। आज भी यहाँ सुजाता के नाम से निर्मित पक्की ईंटों का विशाल स्तूप विद्यमान है। इसके आसपास हुए पुरातात्विक उत्खनन बुद्धकालीन सभ्यता और सामाजिक संरचना की महत्वपूर्ण झलक प्रदान करते हैं।

बकरौर से आगे मातंगी नामक स्थल स्थित है, जिसका संबंध न केवल तथागत से जोड़ा जाता है, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों में भी यह एक पुराण-प्रसिद्ध स्थान है। मान्यता है कि ऋषि मातंगी ने यहाँ कठोर तपस्या कर भगवती मातंगी तथा मतंगेश्वर महादेव की स्थापना की थी। गया जी के सप्त पवित्र कुंडों में मातंगवापी की गणना होती है, जहाँ श्राद्ध और पिंडदान के अवसर पर देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं। यह स्थल बौद्ध और हिंदू परंपराओं के अद्भुत समन्वय का प्रतीक है।

गया जी की आध्यात्मिक महत्ता का एक और आयाम सरस्वती तीर्थ से जुड़ा है। भारतीय परंपरा में जिन स्थानों पर पवित्र सरस्वती नदी के गुप्त प्रवाह की मान्यता है, उनमें गया जी का स्थान विशेष है। यहाँ सरस्वती की धारा ‘विशाला’ नाम से जानी जाती है, जिसका संगम निरंजना नदी के समीप माना जाता है। बकरौर से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित इस स्थल पर भगवती सरस्वती का प्राचीन मंदिर और अनेक पुरातन अवशेष आज भी विद्यमान हैं, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करते हैं।

बौद्ध परंपरा के अनुसार, खीर ग्रहण करने के बाद सिद्धार्थ ने पात्र को निरंजना नदी में प्रवाहित कर दिया था। बहते-बहते जिस स्थान पर वह पात्र किनारे लगा, वही स्थान आज कटोरवा गांव के नाम से जाना जाता है। इसी क्षेत्र में मोचारिम नामक गांव भी है, जिसका संबंध नागराज मुचलिन्द से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि तपस्या काल में नागराज मुचलिन्द ने वर्षा और आंधी से तथागत की रक्षा की थी। आज मोचारिम में विशाल तालाब के चारों ओर बसी आबादी उस स्मृति को जीवित रखे हुए है।

इसके अतिरिक्त बोधगया से लगभग नौ किलोमीटर दूर, निरंजना नदी के उस पार स्थित डुंगेश्वरी पर्वत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहीं तथागत ने वर्षों की कठोर तपस्या के पश्चात मध्यम मार्ग का बोध प्राप्त किया था। आज भी यह स्थल देशी-विदेशी बौद्ध श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।

इसी क्रम में बोधगया का मठ भी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशिष्ट है। इसके समुचित नवोद्धार, प्रामाणिक सूचना केंद्र और संग्रहालय के विकास के माध्यम से बोधगया से जुड़े बौद्ध इतिहास को नई पीढ़ी के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।

इन सभी स्थलों की सबसे बड़ी समस्या आज भी आवागमन और पर्यटकीय सुविधाओं की कमी है। यदि बोधगया से इन स्थानों तक नियमित पर्यटक वाहन, मार्ग संकेतक, गाइड व्यवस्था और आधारभूत सुविधाएँ विकसित कर दी जाएँ, तो पर्यटक न केवल इन स्थलों को सहजता से देख सकेंगे, बल्कि बोधगया में ठहराव की अवधि भी बढ़ेगी।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि बोधगया केवल एक मंदिर या एक नगर नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक-आध्यात्मिक परंपरा का केंद्र है। इसके आसपास फैले बुद्ध से जुड़े स्थलों का समग्र, संवेदनशील और योजनाबद्ध विकास न केवल बिहार पर्यटन को नई ऊँचाई देगा, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर और अधिक गरिमा के साथ स्थापित करेगा। इसके लिए आवश्यकता है—दृष्टि, इच्छाशक्ति और समर्पित प्रयास की।


(रिपोर्ट … राकेश कुमार /गया जी )

Advertisment

9431256550 Call For
Advertisment
Weather

GAYA
Powered By NETMAT INFOTECH