डॉक्टरों की हड़ताल से चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था, सैकड़ों बेहाल मरीज बिना इलाज लौटे
Rakesh Kumar
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गया जी । मगध प्रमंडल के सबसे बड़े सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अनुग्रह मगध मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों के आंदोलन का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। हॉस्टल, मेस और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर डॉक्टरों द्वारा ओपीडी सेवाओं के बहिष्कार के कारण सैकड़ों मरीज बिना इलाज कराए लौटने को मजबूर हो गए।


सुबह से ही अस्पताल परिसर में मरीजों और उनके परिजनों की भीड़ जुटी रही। गया, नवादा, जहानाबाद, औरंगाबाद तथा आसपास के ग्रामीण इलाकों से पहुंचे मरीज घंटों तक चिकित्सकों के आने का इंतजार करते रहे, लेकिन ओपीडी सेवाएं प्रभावित रहने से उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ा। कई मरीजों ने बताया कि आर्थिक तंगी के बावजूद वे इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन डॉक्टरों के आंदोलन के कारण उन्हें उपचार नहीं मिल सका।


आंदोलन का असर केवल ओपीडी तक सीमित नहीं रहा। रजिस्ट्रेशन व्यवस्था भी प्रभावित हुई, जिससे मरीजों को जांच और परामर्श की प्रक्रिया में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अस्पताल में इलाज के लिए आए कई बुजुर्ग, महिलाएं और गंभीर रोगी पूरे दिन इधर-उधर भटकते नजर आए।


जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि हॉस्टल, मेस, सड़क, जल निकासी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। कई बार प्रशासन को अवगत कराने के बावजूद समाधान नहीं होने पर उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।

डॉक्टरों के अनुसार प्रथम वर्ष के कई छात्रों को अब तक हॉस्टल नहीं मिला है, जबकि पुराने हॉस्टलों की स्थिति भी जर्जर है।


वहीं मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों की मांगें जायज हो सकती हैं, लेकिन इसका खामियाजा आम लोगों को नहीं भुगतना चाहिए। उनका कहना है कि अस्पताल में पहले से ही संसाधनों की कमी है और अब हड़ताल जैसी स्थिति से गरीब मरीजों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।


अस्पताल प्रशासन का कहना है कि जूनियर डॉक्टरों के साथ लगातार बातचीत की जा रही है और जल्द ही समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन ने उम्मीद जताई है कि स्वास्थ्य सेवाएं शीघ्र सामान्य हो जाएंगी।


इस घटना ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर कर दिया है। एक तरफ डॉक्टर बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर मरीज इलाज के लिए भटक रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता बनाए रखते हुए डॉक्टरों और मरीजों दोनों के हितों की रक्षा कैसे की जाए।


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