विकास की अंधी दौड़ में दम तोड़ता पर्यावरण
Rakesh Kumar
1975

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष



हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। सरकारी विज्ञापनों, सेमिनारों, पौधारोपण अभियानों और बड़े-बड़े भाषणों के बीच पर्यावरण संरक्षण की बातें खूब होती हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में पर्यावरण संरक्षण हमारी नीतियों का केंद्र है, या फिर यह केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है? आज जब देश के अनेक हिस्सों में जंगलों को काटा जा रहा है, पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है, नदियों को प्रदूषित किया जा रहा है और प्राकृतिक संसाधनों को विकास के नाम पर कॉरपोरेट हितों के हवाले किया जा रहा है, तब विश्व पर्यावरण दिवस आत्ममंथन का अवसर बन जाता है।


भारत सदियों से प्रकृति-पूजक देश रहा है। यहां पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और पशु-पक्षियों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना गया। लेकिन आधुनिक विकास मॉडल ने प्रकृति को एक वस्तु में बदल दिया है। जंगल अब लकड़ी का भंडार बन गए हैं, नदियां पानी की पाइपलाइन और पहाड़ खनिजों की खान समझे जाने लगे हैं। परिणामस्वरूप आज देश जलवायु संकट, जल संकट, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के विनाश जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहा है।



महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में वनों की कटाई का संकट


हाल के वर्षों में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हुई है। सड़क निर्माण, औद्योगिक परियोजनाओं, खनन, बांधों और शहरी विस्तार के नाम पर हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त कर दिए गए। सरकारें इसे विकास की आवश्यकता बताती हैं, लेकिन यह विकास किस कीमत पर हो रहा है, इस पर गंभीर चर्चा नहीं होती।


जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे पृथ्वी के फेफड़े हैं। वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं, तापमान को संतुलित रखते हैं और करोड़ों जीवों का आश्रय होते हैं। जब जंगल काटे जाते हैं तो केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होता है।


मध्य प्रदेश, जिसे देश का "टाइगर स्टेट" कहा जाता है, वहां वन क्षेत्रों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। महाराष्ट्र में भी अनेक परियोजनाओं के लिए जंगलों की बलि दी गई है। सरकारें दावा करती हैं कि इसके बदले दूसरे स्थानों पर वृक्षारोपण किया जाएगा, लेकिन कोई भी कृत्रिम वृक्षारोपण सदियों पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई नहीं कर सकता।

एक प्राकृतिक जंगल में हजारों प्रकार के जीव-जंतु, सूक्ष्म जीव, औषधीय पौधे और जटिल पारिस्थितिक संबंध मौजूद होते हैं। उन्हें कुछ हजार पौधे लगाकर पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता।



अरावली पर्वतमाला: भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा दीवार पर हमला


भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली केवल एक भूगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण की सुरक्षा कवच है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है, भूजल स्तर बनाए रखती है और प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


लेकिन पिछले कुछ दशकों में अरावली का लगातार दोहन हुआ है। अवैध खनन, पत्थर तोड़ने के उद्योग, रियल एस्टेट परियोजनाएं और प्रशासनिक लापरवाही ने इस पर्वतमाला को गंभीर संकट में डाल दिया है।

आज अनेक स्थानों पर अरावली के पहाड़ों को काटकर समतल कर दिया गया है। जिन पहाड़ियों ने हजारों वर्षों तक प्रकृति की रक्षा की, वे आज बुलडोजरों और खनन मशीनों के सामने असहाय दिखाई देती हैं।


सबसे चिंताजनक बात यह है कि विकास के नाम पर होने वाला यह विनाश अक्सर वैधानिक प्रक्रियाओं के संरक्षण में होता है। जब सरकारें पर्यावरणीय मंजूरियों को आसान बनाती हैं, वन संरक्षण कानूनों को कमजोर करती हैं और कॉरपोरेट परियोजनाओं को प्राथमिकता देती हैं, तब पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों तक सीमित रह जाता है।



सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों पर उठते सवाल


अरावली पर्वतमाला को लेकर हालिया अदालती फैसलों ने पर्यावरणविदों के बीच गहरी चिंता पैदा की है। विशेष रूप से उन व्याख्याओं को लेकर विवाद है जिनमें 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को जंगल की श्रेणी में न रखने की चर्चा सामने आई।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छोटी पहाड़ियों को कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया जाता है, तो यह खनन उद्योग और भूमि माफियाओं के लिए खुला निमंत्रण साबित हो सकता है। अरावली जैसी पर्वतमालाओं में केवल ऊंचाई ही पर्यावरणीय महत्व का निर्धारण नहीं करती। छोटी पहाड़ियां भी भूजल संरक्षण, वनस्पति संवर्धन और स्थानीय जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।


पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी व्याख्याएं पर्यावरणीय न्याय की मूल भावना के विपरीत हैं। कानून का उद्देश्य प्रकृति की रक्षा होना चाहिए, न कि उसके दोहन के लिए नए रास्ते खोलना।

यह आलोचना केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि सरकारों ने ऐसी परिस्थितियां पैदा ही क्यों होने दीं, जहां पर्यावरण संरक्षण और विकास को परस्पर विरोधी मान लिया गया?



सोनम वांगचुक की चेतावनी: विकास नहीं, विनाश का रास्ता


लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पिछले कई वर्षों से हिमालयी पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे हैं।

उनका आंदोलन केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। वह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। वांगचुक लगातार कहते रहे हैं कि हिमालय कोई खनिज भंडार नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। यदि हिमालयी क्षेत्रों का अंधाधुंध दोहन जारी रहा तो आने वाले वर्षों में जल संकट, बाढ़, भूस्खलन और जलवायु आपदाएं और भयावह हो जाएंगी।


जब सोनम वांगचुक पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की बात करते हैं, तब वे केवल किसी क्षेत्रीय मांग को नहीं उठा रहे होते, बल्कि पूरे देश के भविष्य की चिंता व्यक्त कर रहे होते हैं।


दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनियों को अक्सर विकास विरोधी बताकर खारिज कर दिया जाता है। जबकि इतिहास गवाह है कि प्रकृति की अनदेखी करके किया गया विकास अंततः समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध होता है।



विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न


सरकारें अक्सर जीडीपी वृद्धि, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी और बड़े निवेश को विकास का प्रतीक बताती हैं। लेकिन क्या विकास का अर्थ केवल सीमेंट, कंक्रीट और खनन है?

यदि किसी परियोजना से हजारों पेड़ कट जाते हैं, नदियां प्रदूषित हो जाती हैं, आदिवासी समुदाय विस्थापित हो जाते हैं और जैव विविधता नष्ट हो जाती है, तो क्या उसे विकास कहा जा सकता है?


आज देश के कई शहर गैस चैंबर बन चुके हैं। गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। भूजल तेजी से नीचे जा रहा है। नदियां सिकुड़ रही हैं। किसान मौसम की अनिश्चितता से परेशान हैं।

इन समस्याओं का कारण केवल वैश्विक जलवायु परिवर्तन नहीं है। इसके पीछे हमारी नीतियां और विकास की प्राथमिकताएं भी जिम्मेदार हैं।


वास्तविक विकास वह होता है जो आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी बनाए रखे। लेकिन वर्तमान मॉडल में प्रकृति को अक्सर बाधा माना जाता है, जिसे हटाकर विकास का रास्ता साफ किया जाता है।



जल संकट: आने वाला सबसे बड़ा खतरा


विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी दे रहे हैं कि 21वीं सदी का सबसे बड़ा संघर्ष पानी को लेकर हो सकता है।

जंगलों की कटाई, पहाड़ों के विनाश और जल स्रोतों के अतिक्रमण के कारण भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। अनेक शहरों और गांवों में पानी का संकट गहराता जा रहा है।

अरावली के क्षरण का सीधा असर दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के भूजल पर पड़ता है। जब पहाड़ नष्ट होते हैं तो वर्षा का पानी जमीन में समाने के बजाय बहकर निकल जाता है। परिणामस्वरूप जल स्रोत सूखने लगते हैं।

विडंबना यह है कि एक ओर सरकारें जल संरक्षण के अभियान चलाती हैं, दूसरी ओर उन्हीं नीतियों को बढ़ावा देती हैं जो प्राकृतिक जल संरक्षण तंत्र को नष्ट कर रही हैं।



जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आपदाएं


भारत आज जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। कहीं भीषण गर्मी है, कहीं अचानक बाढ़ है, कहीं सूखा है और कहीं भूस्खलन।

पहले जो घटनाएं असाधारण मानी जाती थीं, वे अब सामान्य होती जा रही हैं। इसका एक बड़ा कारण प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन है।


जब जंगल काटे जाते हैं तो कार्बन अवशोषण कम हो जाता है। जब पहाड़ खोदे जाते हैं तो पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है। जब नदियों को प्रदूषित किया जाता है तो जल चक्र प्रभावित होता है।

यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न है।



जैव विविधता का विनाश


पृथ्वी पर प्रत्येक जीव का अपना महत्व है। लेकिन मानव-केंद्रित विकास मॉडल ने अनेक प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया है।

जंगलों के नष्ट होने से वन्यजीवों के आवास खत्म हो रहे हैं। पक्षियों की संख्या घट रही है। अनेक दुर्लभ पौधे और जीव हमेशा के लिए समाप्त हो रहे हैं।

जैव विविधता का नुकसान केवल वैज्ञानिक चिंता नहीं है। यह कृषि, स्वास्थ्य और मानव अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है।



इस्लाम की शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण


पर्यावरण संरक्षण केवल आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है। धार्मिक परंपराओं में भी प्रकृति की रक्षा पर विशेष बल दिया गया है।

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया :

"यदि क़यामत आ जाए और तुम्हारे हाथ में पौधा हो, तो यदि संभव हो उसे लगा दो।"

यह हदीस बताती है कि वृक्षारोपण और प्रकृति संरक्षण कितना महत्वपूर्ण कार्य है।

एक अन्य हदीस में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया :

"जो मुसलमान कोई पेड़ लगाता है या खेती करता है और उससे कोई इंसान, पक्षी या जानवर खाता है, तो वह उसके लिए सदका है।"


इन शिक्षाओं में प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का संदेश निहित है। दुर्भाग्य से आज हम उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जहां पेड़ लगाने से अधिक तेजी से उन्हें काटा जा रहा है।

जनता की भूमिका और जिम्मेदारी

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। जनता की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।


लेकिन यह भी सच है कि सबसे बड़ी जिम्मेदारी नीति निर्माताओं की होती है। आम नागरिक कुछ पेड़ लगाकर उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता जो हजारों हेक्टेयर जंगलों की कटाई से होता है।

इसलिए नागरिकों को जागरूक होना होगा, पर्यावरणीय मुद्दों पर सवाल उठाने होंगे और ऐसी नीतियों की मांग करनी होगी जो विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करें।



विकास चाहिए, विनाश नहीं


विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधारोपण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि चेतना का दिवस है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में जंगलों की कटाई, अरावली पर्वतमाला का लगातार दोहन, पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर करने वाले नीतिगत फैसले और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनियों की अनदेखी—ये सब संकेत हैं कि हमारा विकास मॉडल गंभीर पुनर्विचार की मांग करता है।


सरकारों को यह समझना होगा कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि विकास की कीमत जंगलों, नदियों, पहाड़ों और स्वच्छ हवा के रूप में चुकानी पड़े, तो वह विकास नहीं बल्कि भविष्य के साथ किया गया समझौता है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास की परिभाषा को बदला जाए। जीडीपी की ऊंचाई से अधिक महत्वपूर्ण नदियों का प्रवाह है, इमारतों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण जंगलों का अस्तित्व है, और खनन से प्राप्त राजस्व से अधिक मूल्यवान स्वच्छ हवा और सुरक्षित जल है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानेंगे। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब जंगल काटे जा रहे थे, पहाड़ तोड़े जा रहे थे और नदियां मर रही थीं, तब हम चुप क्यों थे?


और शायद उस समय हमारे पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होगा।



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