गया की धरती कब करेगी अपने अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल का सम्मान?
Rakesh Kumar
1723

स्वतंत्रता सेनानी बैकुंठ शुक्ल की पुण्यतिथि (14 मई 1934) पर विशेष



किसी भी देश की आत्मा उसके इतिहास में बसती है। वह इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सरकारों का नहीं होता, बल्कि उन अनगिनत लोगों की कुर्बानियों का होता है जिन्होंने अपने वर्तमान को जलाकर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य रोशन किया। भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी ऐसी ही कुर्बानियों की एक विराट गाथा है। इस देश को आज़ादी केवल राजनीतिक समझौतों या नेताओं के भाषणों से नहीं मिली, बल्कि लाखों स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के खून से मिली है।


दुर्भाग्य यह है कि समय बीतने के साथ हम अपने अनेक महान शहीदों को भूलते चले गये। कुछ नाम इतिहास की किताबों में सिमट गये और कुछ धीरे-धीरे जनस्मृति से भी मिटने लगे। बिहार की धरती ऐसे ही अनेक वीर सपूतों की जन्मभूमि रही है जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिला दिया था। उन्हीं अमर क्रांतिकारियों में एक नाम है बैकुंठ शुक्ल का, जिन्हें 14 मई 1934 को गया सेंट्रल जेल में फाँसी दी गयी थी।


आज जब देश स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान की बात करता है, तब यह प्रश्न बार-बार उठता है कि आखिर बैकुंठ शुक्ल को वह सम्मान अब तक क्यों नहीं मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे? गया सेंट्रल जेल आज भी सामान्य प्रशासनिक पहचान तक सीमित है, जबकि यही वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ बैकुंठ शुक्ल ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया था। यही कारण है कि वर्षों से यह माँग उठती रही है कि गया सेंट्रल जेल का नाम बदलकर “शहीद बैकुंठ शुक्ल केंद्रीय कारा” किया जाए तथा गया स्थित शहीद बैकुंठ शुक्ल पार्क में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की जाए।

यह माँग किसी व्यक्ति या संगठन की निजी माँग नहीं, बल्कि उस इतिहास को सम्मान देने की माँग है जिसे भुला देना राष्ट्र की आत्मा को कमजोर करना होगा।



साधारण किसान परिवार से निकलकर बने महान क्रांतिकारी


बैकुंठ शुक्ल का जन्म वर्ष 1907 में वैशाली जिले के जलालपुर गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम राम बिहारी शुक्ल था। आर्थिक स्थिति सामान्य थी और जीवन ग्रामीण परिवेश में बीत रहा था। उन्होंने सामान्य शिक्षा प्राप्त की और कुछ समय तक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य किया।


लेकिन उनके भीतर एक बेचैनी थी। नौकरी और सामान्य जीवन उन्हें बाँध नहीं पा रहा था। धीरे-धीरे वे अध्यात्म की ओर आकर्षित हुए और अयोध्या जाकर साधु-संतों के बीच रहने लगे। परिवार वालों को लगा कि उनमें संन्यास की भावना जाग गयी है। उन्हें वापस घर लाया गया और राधिका देवी से उनका विवाह कर दिया गया। मगर विवाह के बाद भी उनका मन स्थिर नहीं हुआ। वे साधुओं के साथ घूमते रहे और भीतर ही भीतर देश की दासता उन्हें कचोटती रही।


यह वही दौर था जब पूरा देश अंग्रेजी शासन के खिलाफ उबल रहा था। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और योगेन्द्र शुक्ल जैसे क्रांतिकारियों की गाथाएँ युवाओं के भीतर आग पैदा कर रही थीं। बैकुंठ शुक्ल भी इस ज्वाला से अछूते नहीं रहे।


योगेन्द्र शुक्ल के संपर्क ने बदल दी जिंदगी

जलालपुर गाँव के ही महान क्रांतिकारी योगेन्द्र शुक्ल उस समय अंग्रेजी हुकूमत के लिए आतंक का पर्याय बन चुके थे। वे भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के संगठन “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” से जुड़े हुए थे।


जब बैकुंठ शुक्ल उनके संपर्क में आये, तब उनके जीवन की दिशा बदल गयी। वे क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गये। हाजीपुर का गांधी आश्रम उन दिनों बिहार के क्रांतिकारियों का गुप्त केंद्र था। वहाँ योगेन्द्र शुक्ल, किशोरी प्रसन्न सिंह, शिववचन सिंह, चन्द्रमा सिंह, सुनीति देवी, शारदा देवी और कृष्णा देवी जैसे क्रांतिकारी सक्रिय थे। बैकुंठ शुक्ल भी इसी टोली का हिस्सा बन गये।


उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अपनी पत्नी राधिका देवी को भी आंदोलन से जोड़ा। उस दौर में जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी कठिन माना जाता था, राधिका देवी विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, शराबबंदी आंदोलन और धरना-पिकेटिंग में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं। यह बैकुंठ शुक्ल की आधुनिक और प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।



फणीन्द्र नाथ घोष : क्रांतिकारी से गद्दार बनने तक



फणीन्द्र नाथ घोष मूलतः एक सक्रिय क्रांतिकारी था। वह अखिल भारतीय क्रांतिकारी दल की कार्यकारिणी का सदस्य था और भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद तथा अन्य क्रांतिकारियों के संपर्क में था।

काकोरी कांड के बाद जब अंग्रेजी सरकार ने दमन तेज किया, तब अनेक क्रांतिकारी भूमिगत हो गये। चन्द्रशेखर आज़ाद भी बेतिया पहुँचे और हरिवंश सहाय, केदार मणि शुक्ल, गुलाब चन्द्र गुलाली तथा अन्य क्रांतिकारियों ने उन्हें शरण दी।


1927 में भगत सिंह भी बेतिया पहुँचे और कई दिनों तक विभिन्न क्रांतिकारियों के घरों में रहे। 8-9 सितंबर 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में हुई ऐतिहासिक बैठक में बिहार की ओर से फणीन्द्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी शामिल हुए थे। इसी बैठक में “हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना” के गठन का निर्णय हुआ और बिहार की जिम्मेदारी फणीन्द्र नाथ घोष को सौंपी गयी।


लेकिन 1928 के मौलनिया डाका कांड के बाद हालात बदल गये। अंग्रेज पुलिस ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कसना शुरू किया। कमलनाथ तिवारी की गिरफ्तारी के बाद कई क्रांतिकारी पकड़े गये। इसी क्रम में फणीन्द्र नाथ घोष भी गिरफ्तार हुआ।

अंग्रेज अधिकारियों ने उस पर अमानवीय अत्याचार किये। यातनाओं से टूटकर वह सरकारी गवाह बन गया। उसने केवल अपने साथियों के नाम ही नहीं बताये, बल्कि लाहौर षड्यंत्र केस, असेम्बली बम कांड और सांडर्स वध प्रकरण में भी गवाही दी।


इसी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा तक पहुँचाया गया। इतना ही नहीं, जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आज़ाद शहीद हुए, तब अंग्रेज अभी भी आशंकित थे कि कहीं वह आज़ाद न हों। उस समय फणीन्द्र नाथ घोष ने ही सरकारी गवाह के रूप में शव की पहचान की थी।

क्रांतिकारी आंदोलन में फणीन्द्र घोष का नाम विश्वासघात के प्रतीक के रूप में लिया जाने लगा।



“इस कलंक को धोओगे या ढोओगे?”



फणीन्द्र घोष की गद्दारी से पूरा क्रांतिकारी आंदोलन आक्रोश से भर उठा। पंजाब के क्रांतिकारियों ने बिहार के साथियों को संदेश भेजा—

“इस कलंक को धोओगे या ढोओगे?”

यह संदेश हाजीपुर सदाकत आश्रम में पहुँचा। वहाँ एक आपात बैठक हुई जिसमें योगेन्द्र शुक्ल, अक्षयवट राय, किशोरी प्रसन्न सिंह, सुनीति देवी और अन्य क्रांतिकारी मौजूद थे। हर कोई इस काम को अपने हाथ में लेना चाहता था।


यहाँ तक कि किशोरी प्रसन्न सिंह की पत्नी सुनीति देवी, जो गर्भवती थीं, उन्होंने भी स्वयं को प्रस्तुत किया। उनका तर्क था कि महिला होने के कारण उन पर शक कम होगा। मगर साथियों ने उनकी सुरक्षा का हवाला देकर अनुमति नहीं दी।

अंततः निर्णय हुआ कि गोटी डाली जाएगी। पाँच क्रांतिकारियों के बीच गोटी लगी और भाग्य ने बैकुंठ शुक्ल का नाम चुना। उनके साथी बने चन्द्रमा सिंह।



बेतिया के मीना बाजार में गूँजी “इन्कलाब जिंदाबाद” की आवाज



9 नवंबर 1932 की शाम। बेतिया का मीना बाजार।

बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह साइकिल से वहाँ पहुँचे। उन्होंने एक पान गुमटी पर अपनी साइकिल खड़ी की और फणीन्द्र घोष की दुकान की ओर बढ़ गये।

कुछ विवरणों के अनुसार, भीड़ हटाने के लिए पटाखेनुमा हथगोला फेंका गया जिससे धुआँ फैल गया। इसी अफरातफरी में बैकुंठ शुक्ल ने अपनी खुखरी निकाल ली। फणीन्द्र घोष ने पिस्तौल निकालने की कोशिश की, लेकिन उसे संभलने का अवसर नहीं मिला।

बैकुंठ शुक्ल ने गरजती आवाज में कहा—

“देश के साथ गद्दारी की सजा मौत है।”

इसके बाद दोनों क्रांतिकारियों ने उस पर लगातार वार किये। पूरा मीना बाजार स्तब्ध रह गया। दोनों “इन्कलाब जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए वहाँ से निकल गये।


फणीन्द्र घोष गंभीर रूप से घायल हुआ और कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। उसके मित्र गणेश प्रसाद गुप्त, जो बीच-बचाव में आये थे, वे भी बाद में दम तोड़ बैठे।

गिरफ्तारी और दोस्ती की अद्भुत मिसाल

ब्रिटिश सरकार बौखला उठी। दोनों क्रांतिकारियों की तलाश शुरू हुई। घटनास्थल पर मिली साइकिलों और सामान के आधार पर पुलिस बैकुंठ शुक्ल तक पहुँच गयी।


5 जनवरी 1933 को चन्द्रमा सिंह कानपुर से और 6 जुलाई 1933 को बैकुंठ शुक्ल हाजीपुर पुल के सोनपुर छोर से गिरफ्तार कर लिये गये। गिरफ्तारी के समय वे “इंकलाब जिंदाबाद” और “योगेन्द्र शुक्ल की जय” के नारे लगा रहे थे।

मोतिहारी अदालत में मुकदमा चला। बैकुंठ शुक्ल जानते थे कि यदि चन्द्रमा सिंह को भी फाँसी हुई तो उनका परिवार टूट जाएगा। उन्होंने अपने साथी से कहा—

“तुम्हारे पिता रो रहे थे कि हमारा वंश खत्म हो जाएगा। मेरे कई भाई हैं, मेरा परिवार चलता रहेगा। तुम्हें जीवित रहना चाहिए।”

इसके बाद उन्होंने अदालत में पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। उन्होंने निर्भीक होकर कहा—

“फणीन्द्र घोष देश का कलंक था और मैंने उसकी हत्या कर वह कलंक धो डाला।”

23 फरवरी 1934 को अदालत ने बैकुंठ शुक्ल को फाँसी की सजा सुनाई। चन्द्रमा सिंह को रिहा कर दिया गया। पटना हाईकोर्ट में अपील की गयी, लेकिन 18 अप्रैल 1934 को सजा बरकरार रखी गयी।



गया जेल की वह अंतिम रात



बैकुंठ शुक्ल को गया सेंट्रल जेल लाया गया। जेल अभिलेखों के अनुसार उनका कैदी नंबर 10979/ए था।

प्रसिद्ध क्रांतिकारी विभूतिभूषण दासगुप्त ने अपनी पुस्तक “सरफरोशी की तमन्ना” में उनकी अंतिम रात का मार्मिक वर्णन किया है।

13 मई 1934 की रात गया जेल का पंद्रह नंबर वार्ड इतिहास का साक्षी बना। बैकुंठ शुक्ल ने दासगुप्त से कहा—

“दादा, खुदीराम का फाँसी वाला गीत सुनाइए।”

फिर पूरा वार्ड गूँज उठा—

“हँसी-हँसी परब फाँसी…”

कुछ देर बाद उन्होंने कहा—

“दादा, वंदेमातरम् सुनाइए।”

रातभर जेल में “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” और “वंदेमातरम्” गूँजता रहा।

सुबह पाँच बजे भारी बूटों की आवाज वार्ड में गूँजी। बैकुंठ शुक्ल उठे और बोले—

“दादा, अब तो चलना है। बाहर जाकर बाल विवाह की प्रथा खत्म करने की कोशिश कीजिएगा।”

फाँसीघर की ओर बढ़ते हुए उनकी आखिरी आवाज थी—

“अब चलता हूँ। मैं फिर आऊँगा। देश तो आज़ाद नहीं हुआ… वंदेमातरम्…”


कहा जाता है कि फाँसी के समय गया जेल का सरकारी जल्लाद भी काँप उठा था। जेल सुपरिंटेंडेंट मिस्टर परेरा बार-बार संकेत दे रहे थे, लेकिन उससे लीवर नहीं खिंच रहा था। तब बैकुंठ शुक्ल ने स्वयं कहा—

“देर क्यों करते हो?”

इसके बाद लीवर खींचा गया और भारत माता का यह वीर सपूत अमर हो गया।

उस दिन जेल के कई कर्मचारियों ने भोजन नहीं किया। पूरे गारद में शोक जैसा वातावरण था।



गया सेंट्रल जेल का नाम बदलना क्यों जरूरी है?


बिहार सरकार ने मुजफ्फरपुर जेल का नाम शहीद खुदीराम बोस और भागलपुर जेल का नाम शहीद जुब्बा सहनी के नाम पर कर दिया है। ऐसे में गया सेंट्रल जेल का नाम बैकुंठ शुक्ल के नाम पर रखना पूरी तरह न्यायोचित और ऐतिहासिक रूप से आवश्यक है।

जब कोई संस्था किसी शहीद के नाम से जुड़ती है, तो वह केवल भवन नहीं रहती बल्कि प्रेरणा का केंद्र बन जाती है। यदि गया सेंट्रल जेल का नाम “शहीद बैकुंठ शुक्ल केंद्रीय कारा” रखा जाता है, तो आने वाली पीढ़ियाँ स्वतः उनके बारे में जानने को प्रेरित होंगी।

यह केवल नामकरण नहीं होगा, बल्कि इतिहास के प्रति हमारी जिम्मेदारी का निर्वाह होगा।



बैकुंठ शुक्ल पार्क में आदमकद प्रतिमा क्यों जरूरी है?



गया में “शहीद बैकुंठ शुक्ल पार्क” पहले से मौजूद है, लेकिन विडंबना यह है कि वहाँ आज तक उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित नहीं हो सकी है।

वर्षों से सामाजिक संगठन, छात्र-नौजवान, अधिवक्ता और जनप्रतिनिधि इसकी माँग करते रहे हैं। जिला सामान्य शाखा, गया द्वारा 13 नवंबर 2023 को नगर निगम, भवन निर्माण विभाग और अन्य अधिकारियों को पत्र भेजकर अनापत्ति प्रमाण पत्र माँगा गया था। इसके बावजूद आज तक प्रतिमा स्थापना का कार्य अधूरा है।


यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उपेक्षा का प्रतीक बनता जा रहा है। जिस क्रांतिकारी ने गया की धरती पर फाँसी का फंदा चूमा, उसकी प्रतिमा उसी शहर में अब तक न लग पाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।



सामाजिक संगठनों का लगातार संघर्ष



विनोद प्रसाद, लालजी प्रसाद, मसूद मंजर, इक़बाल हुसैन, बंशीधर ब्रजवासी, अनिल सहनी, देवेश चन्द्र ठाकुर तथा “अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल शहादत दिवस समारोह समिति” लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं।

समिति द्वारा जिला प्रशासन और बिहार सरकार को अनेक ज्ञापन सौंपे गये हैं। माँग की गयी है कि—

गया सेंट्रल जेल का नाम शहीद बैकुंठ शुक्ल के नाम पर रखा जाए, फाँसी स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए तथा पार्क में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की जाए।

इन माँगों को गया शहर के राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का व्यापक समर्थन प्राप्त है।



अब सरकार को ऐतिहासिक निर्णय लेना चाहिए


आज आवश्यकता इस बात की है कि बिहार सरकार और गया जिला प्रशासन इस ऐतिहासिक माँग को और लंबित न रखे। बैकुंठ शुक्ल केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि भारत की क्रांतिकारी परंपरा के अमर प्रतीक हैं।


गया सेंट्रल जेल का नाम “शहीद बैकुंठ शुक्ल केंद्रीय कारा” करना, फाँसी स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करना और बैकुंठ शुक्ल पार्क में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित करना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि यह राष्ट्र की ओर से एक अमर क्रांतिकारी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


जब तक भारत में स्वतंत्रता, त्याग, दोस्ती, क्रांति और राष्ट्रभक्ति की चर्चा होगी, तब तक अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल का नाम सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता रहेगा। गया की धरती को अब अपने इस अमर शहीद का पूरा सम्मान करना ही होगा।


Advertisment

9431256550 Call For
Advertisment
Weather

GAYA
Powered By NETMAT INFOTECH