नक्सली बेल्ट में ‘सफेद जहर’ का खेल : गया में 7 लाख की अफीम दूध पकड़ी गई, तीन तस्कर दबोचे गए
Rakesh Kumar
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इमामगंज (गया) : नक्सल बेल्ट की खामोश पहाड़ियों के बीच एक बार फिर ‘सफेद जहर’ का काला सच बेनकाब हुआ है। भदवर थाना क्षेत्र के रबदी गांव में पुलिस की विशेष टीम ने फिल्मी अंदाज में छापेमारी कर अफीम का दूध बरामद किया है। स्टील के कमंडल और प्लास्टिक के जार में छिपाकर ले जाई जा रही करीब 3.712 लीटर अफीम का दूध पकड़ा गया, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 7 लाख रुपये बताई जा रही है। मौके से तीन तस्करों को गिरफ्तार कर लिया गया है।


गुप्त सूचना और पहाड़ी घेराबंदी


वरीय अधिकारियों को इनपुट मिला था कि रबदी पहाड़ी से होकर अफीम की खेप बाहर भेजी जानी है। सूचना मिलते ही इमामगंज के एसडीपीओ कमलेश कुमार के नेतृत्व में स्पेशल टीम बनाई गई। ग्राम रबदी से पूर्व पहाड़ी की ओर जाने वाली कच्ची सड़क पर जाल बिछाया गया। जैसे ही संदिग्ध पहुंचे, पुलिस ने दबिश दी।



तलाशी के दौरान स्टील का कमंडल और प्लास्टिक का जार बरामद हुआ। जब ढक्कन खोला गया तो अंदर ‘अफीम का दूध’ मिला—वही कच्चा पदार्थ जिससे आगे चलकर अफीम और अन्य मादक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अमिरका सिंह, मुकेश कुमार और कृष्णदेव सिंह के रूप में हुई है। तीनों पन्नातांड़ (थाना भदवर) के निवासी बताए जा रहे हैं।


एसडीपीओ कमलेश कुमार ने कहा, “गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई की गई। तीन तस्करों को पकड़ा गया है। नेटवर्क की गहराई से जांच की जा रही है।”

खेत से ‘काला सोना’ बनने तक

सूत्रों के मुताबिक, गया के डुमरिया, इमामगंज, बाराचट्टी जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में अफीम की अवैध खेती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। अक्टूबर-नवंबर में बोई जाने वाली फसल 60-90 दिनों में फूल देती है। इसके बाद फूल पर बारीक चीरा लगाकर निकलने वाले दूध को इकट्ठा किया जाता है। यही ‘दूध’ आगे चलकर ठोस रूप लेकर लाखों के कारोबार में बदल जाता है।

स्थानीय स्तर पर इसकी कीमत डेढ़ से दो लाख रुपये प्रति किलो बताई जाती है, लेकिन जैसे ही खेप हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर या राजस्थान की ओर बढ़ती है, कीमत कई गुना बढ़ जाती है। यही वजह है कि तस्कर जान जोखिम में डालकर भी पहाड़ी रास्तों से इसे बाहर पहुंचाने की कोशिश करते हैं।


नक्सल बेल्ट में ‘नार्को-रूट’?


गया-झारखंड सीमा से सटे दुर्गम इलाके वर्षों से अवैध खेती के लिए बदनाम रहे हैं। समय-समय पर नारकोटिक्स, वन विभाग और पुलिस द्वारा फसल विनष्टीकरण अभियान चलाया जाता है, लेकिन पूरी तरह लगाम नहीं लग पाई है। सूत्र तो यहां तक दावा करते हैं कि राज्य से बाहर निकलने के बाद यह खेप अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक पहुंच जाती है, हालांकि अधिकारी इस पर आधिकारिक पुष्टि से बचते हैं।


ताजा बरामदगी ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह सिर्फ तीन तस्करों की करतूत है या इसके पीछे कोई बड़ा सिंडिकेट सक्रिय है? फिलहाल पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर सप्लाई चेन की परतें खोलने में जुटी है।

गया की पहाड़ियों में ‘सफेद जहर’ के इस खेल पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं।

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