Rakesh Kumar
डाल्टनगंज।झारखंड के पलामू ज़िले के डाल्टनगंज स्थित कुंड मोहल्ले से रमज़ान-उल-मुबारक के पाक महीने में एक बेहद दिल छू लेने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां सात वर्षीय नन्हीं बच्ची अब्रिश अहमद खान ने अपना पहला रोज़ा रखा। हेरिटेज जेनी किड्स स्कूल में कक्षा एक की छात्रा अब्रिश ने कम उम्र में ही पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर रोज़ा मुकम्मल किया और अपने जज़्बे से बड़ों तक को प्रभावित कर दिया।
रमज़ान का महीना इबादत, सब्र और आत्मसंयम का पैग़ाम देता है। ऐसे में जब इतनी छोटी उम्र की बच्ची खुद आगे बढ़कर रोज़ा रखने की इच्छा जाहिर करती है, तो यह न केवल उसके जज़्बे को दर्शाता है, बल्कि उसके घर के धार्मिक और नैतिक माहौल को भी बखूबी बयां करता है।
अब्रिश के पिता शादाब अहमद खान और मां शाज़िया तरन्नुम बताते हैं कि उनकी बेटी बचपन से ही नमाज़ और रोज़े जैसी इबादतों को लेकर गंभीर रही है। घर में होने वाली इबादतों को देखकर उसने खुद ही रोज़ा रखने की जिद की। मां के मुताबिक, उन्होंने हमेशा अपनी बेटी को इस्लामी तालीम और अच्छे संस्कार देने की कोशिश की है, जिसका असर आज साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि इतनी छोटी उम्र में अब्रिश का यह कदम उनके लिए बेहद खुशी और सुकून देने वाला है।
अब्रिश ने न केवल रोज़ा रखा, बल्कि पूरे दिन सब्र के साथ इबादत में भी खुद को शामिल रखा। इफ्तार के वक्त उसने अल्लाह से दुआ मांगी कि उसका पूरा परिवार खुशहाल रहे और सभी पर रहमत बनी रहे। उसकी मासूम दुआ और नेक नीयत ने माहौल को और भी भावुक बना दिया।
इस प्रेरणादायक कहानी का एक और प्यारा पहलू है अब्रिश का छोटा भाई ज़ोहान, जिसकी उम्र महज चार साल है। अपनी बहन को रोज़ा रखते देख वह भी रोज़ा रखने की जिद कर रहा है। परिवार के लोग उसे समझा रहे हैं कि अभी उसकी उम्र बहुत कम है, लेकिन उसके उत्साह और जज़्बे को देखकर हर कोई मुस्कुरा देता है। बच्चों में संस्कार और धार्मिक भावनाएं परिवार की तरबियत से विकसित होती हैं।
पिता शादाब अहमद खान का कहना है कि बच्चों का इस तरह इबादत की ओर झुकाव उनके लिए गर्व की बात है। उनका मानना है कि यदि बचपन से ही बच्चों को सही दिशा और अच्छे संस्कार दिए जाएं, तो वे न केवल अच्छे इंसान बनते हैं, बल्कि समाज के लिए भी मिसाल पेश करते हैं।